आदरणीय/ आदरणीया
नमस्ते।
भूमि अधिग्रहण संबंधी संशोधन अध्यादेश के विरोध में आयोजित आयोजनों की समीक्षा करता लेख संलग्न है। आशा है कि उपयोगी पायेंगे।
प्रतिक्रिया और सुझावों की प्रतीक्षा रहेगी।
सादर-साभार
आपका
अरुण तिवारी
9868793799 / 011-22043335
amethiarun@gmail.com
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संदर्भ: भूमि अधिग्रहण संशोधन अध्यादेश
भू-अधिकार आयोजनों का हासिल
भू-अधिकार के मसले पर सरकार को चेतावनी देने के आयोजनों का एक दौर संपन्न हो चुका है। वाया अन्ना, आयोजन का अगला दौर नौ मार्च को वर्धा (महाराष्ट्र) स्थित सेवाग्राम से शुरु होगा। इन आयोजनों का जनता को हुआ हासिल अभी सिर्फ इतना ही है कि वह जान चुकी है कि कोई ऐसा कानून बना था, जिसमें उनकी राय के बगैर खेती-किसानी की ज़मीन नहीं ली जा सकती थी। मोदी सरकार ने उसमें कुछ ऐसा परिवर्तन किया है कि जिसके कारण सरकार जब चाहे, खेती-किसानी की जमीन कब्जा सकती है। संभव है कि देश के पांच करोङ भूमिहीनों में से कुछ ने यह सपना भी हासिल किया हो कि दिल्ली कें संसद मार्ग को कई बार रौंदने पर रहने और कहने को ज़मीन का एक टुकङा हासिल किया जा सकता है। तीसरे हासिल के तौर पर जनता फिलहाल राहत की सांस महसूस कर सकती है कि प्रधानमंत्री जी बिल में बदलाव के लिए तैयार हो गये हैं। इस नरमी के साथ-साथ उन्होने आंदोलनकारियों को एक गर्म संदेश भी दिया है - ''देश संविधान के दायरे में चलेगा। किसी को कानून अपने हाथों में लेने की अनुमति नहीं दी जायेगी।'' एक तरफ छवि को पहंुची आंच को ठंडा करने का प्रयास, दूसरी ओर आंदोलनकारियों को भङकाने वाली धमकी!
प्रधानमंत्री जी के इस अंदाज का संकेेत क्या है ? यह तो समय बतायेगा। किंतु फिलहाल इतना तो कहा ही जा सकता है मोदी सरकार ने इन आयोजनों से खोया ही खोया है; पाया कुछ नहीं। मोदी सरकार को 'उद्योगपतियों की सरकार' प्रतिबिम्बित करने वाला संदेश देश मंे पहुंच चुका है। 'उद्योगपतियों के लिए कुछ भी करेगा' की छवि अर्जित कर श्री मोदी ने 'सबका साथ-सबका विकास' का नारा खो दिया है। तीर, कमान से निकल चुका है। भूमि अधिग्रहण का विरोध करने पर भूमि मालिक को तीन लाख रुपये तक का जुर्माना और छह महीने तक की सजा के प्रावधान ने शासन की नीयत और संवेदनहीनता की पोल खोल दी है। मुआवजा लेने से इंकार करने पर मुआवजा राशि सरकारी खजाने मंे जमा करा दी जायेगी और भूमि मालिक को जमीन से बेदखल कर दिया जायेगा। मुकदमा होने के बावजूद जमीन का अधिग्रहण किया जा सकेगा।ऐसे प्रावधानों के रहते आखिरकार, कोई कैसे मान सकता है कि भूमि अधिग्रहण अध्यादेश, भूमि मालिकों का हित साधने आया है।
चैतरफा नाराजगी
अध्यादेश विरोधी आयोजन के दौरान पहले राजनेताओं से मंच साझा न करे की बात और फिर बुला-बलाकर मंच पर बैठाने के तमाशे से खोया अन्ना ने भी है। किंतु सच है कि विपक्षी ही नहीं, भारतीय जनता पार्टी के साथ खङे दलों द्वारा भी संशोधन विधेयक के विरोध से खोया तो सत्तारूढ दल ने ही ज्यादा है। याद कीजिए, झारखण्ड से हेमंत सोरेन ने आर्थिक नाकेबंदी की चेतावनी दी। सोनिया, ममता, मुलायम, नीतीश, लालू, केजरीवाल से लेकर शिवसेना, अकाली दल की नाराजगी आपने सुनी ही। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और स्वदेशी जागरण मंच भाजपा के मार्गदर्शक संरक्षक संगठन हैं। संशोधन विधेयक के विरोध में ऐसे संगठनों के खुलकर सामने आने से यह संदेश भी गया कि यदि संशोधन विधेयक में जरा भी अनुकूलता होती, तो भाजपा हितैषी संगठन ही उसका विरोध क्यों करते ?
कोशिशों का झूठ-सच
दरअसल, संशोधन की भाषा इतनी सरल और स्पष्ट है कि जिसे पढकर आम आदमी भी संशोधन की मंशा और प्रभाव.. सहज ही समझ सकता है। यही कारण है कि मोदी सरकार समर्थक संगठन ही नहीं, स्वयं कई भाजपा सांसद-विधायकों को भी चिंता हो रही है कि लोगों ने सवाल किए, तो झूठ बोलने पर भी अब बचने की कोई गुंजाइश नहीं है। बावजूद इसके दुखद है कि मोदी के रणनीतिकार झूठ को सच बताने की कवायद में जुट गये हैं। वे कह रहे हैं कि संशोधन किसानों के हित में है। भाजपा के पदाधिकारी यह प्रचारित करने में जुट गये कि यदि संशोधन न किए जाते, तो किसानों को मुआवजा कम मिलता; गांव के गरीब के विकास की प्रक्रिया बाधित होती। सरकार गरीब के हित में रोजगार के लिए जो करना चाहती है, उसमें मुश्किल आयेगी। यदि सहमति लेकर भूमि अधिग्रहण करना पङा, तो देश की रक्षा परियोजनाओं की सुरक्षा को लेकर मुश्किलात खङी हो जायेंगी। हालांकि प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर वक्त देते हुए यह दिखाने की भरसक कोशिश की है कि किसानों के लिए कोई भी सुधार करेंगे; किंतु श्री अरुण जेटली द्वारा सदन में दिए वक्तव्य से लेकर भाजपा सचिव श्रीकांत शर्मा वर्मा द्वारा लिखे लेख का संदेश यही है। भूमि अधिग्रहण कानून में हुए संशोधन का जिन्न जंतर-मंतर से निकलकर देश में नुमाया न होने पाये। चेतावनी यात्रा के जंतर-मंतर पहुंचने से पहले ही मोदी सरकार द्वारा इसकी रोकथाम की कोशिश का संदेश भी यही है।
सरकार की बाजीगरी
गौर करने की बात है कि भाजपा के रणनीतिकारों ने पहले-पहल एक विनम्र संदेश देने की कोशिश की कि वह एक लोकतंात्रिक सरकार है। अतः सुझावों का स्वागत करेगी। मीडिया ने इसे ऐसे प्रचारित किया, मानो अन्ना के आंदोलन के समक्ष मोदी सरकार झुक गई हो। कितु जो लोग मोदी के मुख्यमंत्रित्व काल से परिचित थे, वे जानते थे कि सरकार द्वारा दर्शाई विनम्रता तात्कालिक है; यही हुआ। गृहमंत्री राजनाथ सिंह जी ने किसान संगठन प्रतिनिधियों से क्या सुझाव लिए और क्या आश्वासन दिए; मालूम नहीं। किंतु इतना साफ दिखा कि राजनाथ सिंह जी ने जैसे ही कुछेक किसान संगठनों से बातचीत का एक दौर संपन्न किया, सरकार का रवैया बदल गया। 24 फरवरी तक जो सरकार रक्षात्मक नजर आ रही थी, वह अचानक आक्रामक हो गई। सर्वदलीय चर्चा के विचार को कूङे के डिब्बे में डाल दिया। वैकेया नायडू भले ही कहते रहे कि सुझावों पर विचार होगा; किंतु पार्टी प्रवक्ताओं के तेवर तल्ख हो गये।
अफवाहांे का जंतर-मंतर
एक ओर दुष्प्रचार शुरु हुआ, मानो भूमि अधिग्रहण के मुद्दे पर आवाज बुलंद करना, किसान संगठनों का घोषित एकाधिकार हो और अन्ना उसमें अनाधिकार चेष्टा कर रहे हों। अन्ना की आलोचना करने वाले बैनर जंतर-मंतर की सङक किनारे रातो-रात उग आये। एक ही मसले पर समानान्तर कई मंच बन गये। कई कलम और कैमरों ने मामले को किसान संगठन बनाम एन जी ओ बनाकर भी पेश किया। किसी ने कहा कि इन लोगों ने अन्ना को सिर्फ उपयोग किया है। किसी ने कहा कि अन्ना के मंच पर कांग्रेसियों का जमावङा था, तो किसी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनुगामी संगठनों के प्रतिनिधियों से अन्ना की मुलाकातों की खबरें फैलाई। जरा सोचिए! ऐसी अफवाहों का बाजार गर्म करने का एकमेव मकसद भू-अधिकार से जुङे मसले पर एकजुट संगठनों के बीच मतैक्य पैदा करने के अलावा भला और क्या हो सकता है ?
नीयत पर सवाल
संशोधन के पक्ष में भाजपा के सफाई प्रचार पर सवालिया निशान लगाते सवाल कई हैं। पहला, सरकार यह तय करने वाली कौन होती है कि कोई परियोजना लोगों के हित में है या नहीं ? दूसरा, स्थानीय लोगों को यह तय करने देने में देश का क्या नुकसान है कि जिस परियोजना के लिए सरकार भूमि अधिग्रहण करना चाहती है, वह स्थानीय लोगों के हित मे है या नहीं ? तीसरा, क्या सरकार यह समझती है कि गांव के लोग इतने मूर्ख हैं कि यदि परियोजना स्थानीय लोगों के हित में हुई, तो भी वे भूमि अधिग्रहण के लिए अपनी ज़मीन देने को तैयार नहीं होंगे ? हित में होने के बावजूद लोग परियोजना के लिए ज़मीन नहीं दें; यह तभी हो सकता है जब या तो भूमिधरों की कोई मज़बूरी हो अथवा वे उस परियोजना को न चाहते हों। जाहिर है कि परियोजना यदि स्थानीय लोगों की मजबूरी का निराकरण करने, वाजिब लाभ देने तथा दूरगामी हित साधने वाली हुई, तो लोग सहमत न हों; ऐसा हो नहीं सकता। अपने भारत देश ऐसे लाखों उदाहरण से भरा पङा हैं, जहां भूमिधरांे ने सार्वजनिक उपयोग के लिए बिना कोई पैसा लिए ज़मीनें दीं। अतः सहमति की शर्त को हटाना; अपने आप में भूमि अधिग्रहण कर्ता की नीयत पर शक पैदा करता है।
सहमति शर्त जरूरी क्यों ?
सहमति की शर्त इसलिए भी जरूरी है, ताकि लोगों अपनी भूमि के लेन-देन की शर्तें स्वयं तय करने के लिए आजाद बने रहें। इस शर्त का एक बङा लाभ यह होगा कि यदि लोग समझदार होंगे तो परियोजना और उसके संचालक, भूमि अधिग्रहण करने के बाद भी स्थानीय जन हितैषी बने रहेंगे। यह नहीं होगा कि बिजली परियोजना लगाते वक्त वादे करें कि जिनकी जमीन गई, उन्हे 24 घंटे बिजली मिलेगी और बाद में लोग सिर्फ तार ही निहारते रह जायें। भूमि अधिग्रहण के वक्त कहा जाये कि फैक्टरी प्रदूषण नहीं करेेगी; बाद में उसकी परवाह ही न करे। उत्तर प्रदेश के सोनभद्र में सरकारी ताप विद्युत घर के कारण आदिवासियों की जमीनें भी गईं और अब सेहत का भी सत्यानाश हो रहा है। चाहे खनन उद्योग हो या कोई फैक्टरी; एक बार जमीन हासिल हो जाने के बाद स्थानीय लोगों की जिंदगी व हित से खिलवाङ करने के कारनामें को देखते हुए जन-सहमति का प्रावधान को लागू करना और जरूरी है। खासकर, खनन और उद्योग क्षेत्र के लिए गये अधिग्रहण में ऐसे खतरे ज्यादा होते हैं।
कुछ जरूरी सवाल
भूमि अधिग्रहण से जुङा एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि संशोधन पेश करने से पहले भारत की कुल भूमि में उद्योग, खेती, नगर, पानी, जंगल की भूमि का अनुपात तय करना जरूरी नहीं ? क्या यह देखना जरूरी नहीं कि किस इलाके में निर्माण हो और देश के किस भूगोल को निर्माण से मुक्त रखा जाये ? पेश आंकङों के मुताबिक, अधिग्रहित की गई कितनी ही भूमि ऐसी है, जो कई साल बीत जाने के बावजूद आवंटित ही नहीं की गई। ऐसी अधिग्रहित की गई भूमि का रकबा भी कम नहीं, आवंटित होने के बावजूद आवंटी जिसका सालों-साल उपयोग नहीं कर सके। क्या यह जरूरी नहीं कि सरकार पहले से अधिग्रहित भूमि के उपयोग को प्राथमिकता बनाये ? क्या औद्योगीकरण और शहरीकरण की कोई सीमा रेखा बनाना जरूरी नहीं ? यही न करने का नतीजा है कि देश तमाम पलायन, पर्यावरण और रोजगार में होड की अनेक समस्याओं से जूझ रहा है।
खेती की जमीन पर उद्योग लगाने की जिद्द को लेकर भी एक प्रश्न तो है ही। इस प्रश्न के उत्तर में भाजपा प्रवक्ता ने प्रश्न दागा कि बंजर भूमि पर उद्योग लगाया, तो पानी कहां से आयेगा ? प्रश्न उठाते हुए वह शायद भूल गये कि पानी की कमी से ही नहीं, जलभराव के कारण भी जमीन बंजर होती है। कृषि भूमि कब्जाने की जिद्द के पीछे का असली उद्देश्य, कृषि भूमि की कीमतों में हो रही बेशुमार वृद्धि है। बिना उद्योग चलाये मुनाफा कमाने का इससे बेहतर नुस्खा और क्या हो सकता है ? कृषि और उसके प्रसंस्करित उत्पादों के बाजार पर कब्जे को लेकर बङी कंपनियों में होङ भी इसका एक कारण है। दुखद है कि हमारे जिस राष्ट्रपिता द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों को आगे रखकर दुनिया सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय का सपना देखती है, उसी गांधी के देश मंें 'सबका साथ-सबका विकास' का नारा खोखला साबित होने की ओर अग्रसर है। यह न होने पाये।
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